Sunday, October 08, 2006

कहने को लफ़्ज़ तो बहुत थे तुम्हारे पास
और उन्हें उडाते भी थे तुम फ़ाकामस्ती में
साबुन के बुलबुलों की तरह!
मैं तो बेज़ुबां देखती रह जाती
उनके रंग, उनकी चमक, उनकी उडान
सात साल की बच्ची की तरह!
मिट्टिया रंग की मेरी आंखों में
उतर आते थे वहीं रंग, वही चमक, वही उडान
मैं अपने आप को सुंदर समझने लगती!

यह समझ भी काफ़ी बुरी चीज़ है...
एक बार चली आती है तो फ़िर आती ही चली जाती है!

समझ ने मजबूर किया तो चाहने लगी -
बुलबुलों को और अच्छे से समझ लूं
उन्हें अपने पास सजा के रखूं.. हमेशा के लिए.

फ़िर क्या हुआ?
तुम तो समझदार हो.
लफ़्ज़ों के खोंखले बुलबुले उड़ाना तुमसे छोड़ा न जाता...
तुमनें मुझे छोड़ दिया!

2 Comments:

Blogger Sumedha said...

गायत्री, सही! तुझ्या या ब्लॉगचा पत्ताच नव्हता मला. महानच लिहीतेस ग तू!

Monday, October 09, 2006 1:32:00 AM  
Anonymous Anonymous said...

:)

- saksham

Friday, October 13, 2006 3:16:00 PM  

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