Monday, July 09, 2007

हम ना समझें वो बातें बताएँ तो कैसे
तुम ना मानोगे, बातें बनाऍं तो कैसे

सुर्ख पर्दे में लिपटा है आईना दिल का
अपनी पलकों की चिलमन उठाऍं तो कैसे

तकमीलें-ख्वाब करने की उम्मीदें गोया
जब भी सोती है उनको जगाएँ तो कैसे

इक नज़ाकत से खोला था तूफ़ाँ से पहले
हम जिगर का दरीचा भुलाऍं तो कैसे

बेरुख़ी गुल की तुम तो कभी सह न पाए
हम यें खामोश शिकवें सुनाएँ तो कैसे

2 Comments:

Blogger Anand Sarolkar said...

>> सुर्ख पर्दे में लिपटा है आईना दिल का
अपनी पलकों की चिलमन उठाऍं तो कैसे <<

Wah!!! Subhanallah!

Tuesday, July 10, 2007 12:19:00 PM  
Blogger Raj said...

अच्छी गझल है. पहला शेर और मतला बहोत खूब. इसे पढने के बाद मजरूह साब की 'रस्मे-उल्फत को निभाएं तो निभाएं कैसे' याद आ गई. (शायद काफिया मिलता है इस लिए)

Tuesday, July 10, 2007 9:57:00 PM  

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