हम ना समझें वो बातें बताएँ तो कैसे
तुम ना मानोगे, बातें बनाऍं तो कैसे
सुर्ख पर्दे में लिपटा है आईना दिल का
अपनी पलकों की चिलमन उठाऍं तो कैसे
तकमीलें-ख्वाब करने की उम्मीदें गोया
जब भी सोती है उनको जगाएँ तो कैसे
इक नज़ाकत से खोला था तूफ़ाँ से पहले
हम जिगर का दरीचा भुलाऍं तो कैसे
बेरुख़ी गुल की तुम तो कभी सह न पाए
हम यें खामोश शिकवें सुनाएँ तो कैसे
तुम ना मानोगे, बातें बनाऍं तो कैसे
सुर्ख पर्दे में लिपटा है आईना दिल का
अपनी पलकों की चिलमन उठाऍं तो कैसे
तकमीलें-ख्वाब करने की उम्मीदें गोया
जब भी सोती है उनको जगाएँ तो कैसे
इक नज़ाकत से खोला था तूफ़ाँ से पहले
हम जिगर का दरीचा भुलाऍं तो कैसे
बेरुख़ी गुल की तुम तो कभी सह न पाए
हम यें खामोश शिकवें सुनाएँ तो कैसे

2 Comments:
>> सुर्ख पर्दे में लिपटा है आईना दिल का
अपनी पलकों की चिलमन उठाऍं तो कैसे <<
Wah!!! Subhanallah!
अच्छी गझल है. पहला शेर और मतला बहोत खूब. इसे पढने के बाद मजरूह साब की 'रस्मे-उल्फत को निभाएं तो निभाएं कैसे' याद आ गई. (शायद काफिया मिलता है इस लिए)
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